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निर्देशक संदेश

प्रो. डी. एस. रमेश
निदेशक

निदेशक की कलम से…..

भारतीय भूचुंबकत्व संस्थान (भा.भू.सं.), मुंबई देश का एक प्रमुख संस्थान है, जो सक्रिय रूप से भूचुंबकत्व और भूभौतिकी, वायुमंडलीय और अंतरिक्ष भौतिकी और प्लाज़्मा भौतिकी जैसे संबद्ध क्षेत्रों में बुनियादी और व्यावहारिक अनुसंधान में लगा हुआ है। भूचुंबकत्व अध्ययन का एक क्षेत्र है जो वास्तव में बहु-विषयक है जिसमें भौतिकी, गणित, भूविज्ञान, भूभौतिकी, वायुमंडलीय भौतिकी, प्लाज़्मा भौतिकी, द्रव गतिकी, भू-रसायनिकी और अरैखिक गतिकी जैसे कर्इ विषय शामिल हैं। भूचुंबकत्व के अध्ययन में पृथ्वी के केंद्र से लेकर पूरा सौरमंडल शामिल है जो सभी ग्रहों और सूर्य तक फैला हुआ है।

1841 में अपनी स्थापना के बाद से ही, कुलाबा-अलीबाग वेधशाला 175 से अधिक वर्षों के लिए उच्च गुणवत्ता वाले भूचुंबकीय अभिलेख तैयार करता आ रहा है। भारतीय भूचुंबकत्व संस्थान (भा.भू.सं.) 1971 में स्वायत्त हो गया और अब विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग, भारत सरकार के अंतर्गत है। यह वर्तमान में 12 भूचुंबकीय वेधशालाएं और तिरुनेलवेली, इलाहाबाद और शिलांग में तीन क्षेत्रीय केंद्र संचालित कर रहा है। संस्थान नियमित रूप से आर्कटिक और अंटार्कटिक के लिए भारतीय अभियानों में भाग लेता है।

भा.भू.सं. की यही परिकल्पना है कि भारत को भूचुंबकत्व और संबद्ध क्षेत्रों में ज्ञान का एक वैश्विक केंद्र बनने की सक्षमता प्रदान की जाए। संस्थान को सौंपे गए कार्यों में इसके चुंबकत्वमापी नेटवर्क के तहत चुंबकीय वेधशालाओं का अनुरक्षण और आधुनिकीकरण करना, नई वेधशालाएं स्थापित करना और उच्च गुणवत्ता वाले डेटा को भारतीय चुंबकीय डेटा संस्करणों के रूप में प्रकाशित करना भी शामिल है। इन वेधशालाओं से प्राप्त चुंबकीय अभिलेख अंतरिक्ष-समीपी पर्यावरण में बहने वाली विद्युत धारा प्रणालियों के अध्ययन के लिए उपयोगी साधन के रूप में काम करते हैं, जिसकी समझ से सैटेलाइट नेविगेशन प्रणालियों की कारगरता की निगरानी और आकलन संभव हो पाता है। वर्ल्ड डेटा सेंटर (WDC) –भूचुंबकत्व, मुंबई अब इंटरनेशनल काउंसिल फॉर साइंस-वर्ल्ड डेटा सिस्टम का सदस्य है। भा.भू.सं. भारतीय नौसेना, भारतीय तटरक्षक बल, नौसेना वायु स्टेशनों के चुंबकीय कम्पास का अंशांकन भी करता है, और इसरो, डीआरडीओ, DoS, NHPC सहित कई अनुसंधान और अन्य सरकारी संगठनों आदि को उच्च वियोजन के डिजिटल चुंबकीय डेटा उपलब्ध कराने की सेवाएं प्रदान कर रहा है।

अनुसंधान के मोर्चे पर, भा.भू.सं. विभिन्न प्रकार के भूभौतिकीय साधनों का उपयोग करते हुए समय के विभिन्न पैमानों पर भूगर्भ में होने वाली प्रक्रियाओं को समझने में लगा हुआ है। अंतरिक्ष भूचुंबकत्व और प्लाज़्मा भौतिकी के क्षेत्रों में, भूचुंबकीय क्षेत्र परिवर्तनों के साथ रेडियो और प्रकाशीय दूरस्थ संवेदन को पृथ्वी के निकट अंतरिक्ष वातावरण की जांच के लिए नैदानिक उपकरण के रूप में नियोजित किया जाता है। सौरपवन, चुंबकमंडल और आयनमंडल सहित अंतरिक्ष पर्यावरण में आवेशित कणों, विद्युत क्षेत्रों और धाराओं पर कई सैद्धांतिक अध्ययन किए जा रहे हैं।

हाल ही में, तीन नए अंतर्विषयी अनुसंधान कार्यक्रम नामत: (क) अंतरिक्ष मौसम का पूर्वानुमान, (ख) जलवायु विविधता और परिवर्तन और (ग) स्थलमंडल-वायुमंडल-आयनमंडल-चुंबकमंडल (एल.ए.आई.एम.) का युग्मन और गतिकी भा.भू.सं. में शुरू किए गए हैं, जिनका अत्यधिक सामाजिक महत्व और प्रासंगिकता है। इनमें से प्रत्येक कार्यक्रम के तहत की जाने वाली गतिविधियों का संक्षिप्त विवरण नीचे दिया गया है।

(क) अंतरिक्ष मौसम को आम तौर पर पृथ्वी के उच्चतर वायुमंडल और बाहरी अंतरिक्ष में मौजूद विक्षुब्ध मौसम के रूप में जाना जाता है, जो सूर्य पर होने वाली किरीटीय पिंड उत्क्षेपण (सी.एम.ई.), सौर ज्वालाओं आदि जैसी ऊर्जाशील घटनाओं के कारण होता है, जिसका सैटेलाइट की कक्षीय स्थिति, उस पर स्थित इलेक्ट्रॉनिक्स, अंतरिक्ष यात्रियों की विकिरण सुरक्षा, उपग्रह संचार/नेविगेशन प्रणाली, विद्युतीय ऊर्जा ग्रिड और पृथ्वी पर लंबी दूरी की पाइप-लाइनों पर संभावित प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए अंतरिक्ष मौसम पूर्वानुमान मॉडल विकसित करना अनिवार्य है जो उक्त प्रणालियों को होने वाले संबंधित खतरों को कम करने के लिए, उनकी कुछ घंटों से लेकर कुछ दिनों की अंतरिक्ष मौसम की गंभीरता के बारे में प्रयोक्ताओं को सचेत कर सकता है।

(ख) हाल ही में भा.भू.सं. वैज्ञानिकों ने जलवायु परिवर्तनशीलता के संभावित कारकों की पहचान और उसके परिमाण का पता लगाने के लिए स्थानांतरण उत्क्रम-मापन नामक सूचना सिद्धांत तकनीक द्वारा एक समाधान खोजा है। GMTA और अन्य परिवर्ती मात्राओं के बीच आदान-प्रदान हुई जानकारी का अनुमान लगाने के लिए 1984-2005 के दौरान किए गए ग्रीनहाउस गैसों, ज्वालामुखीय एरोसोल, सौर गतिविधि, ENSO, वैश्विक औसत तापमान असंगति (GMTA) के वैश्विक मापनों का उपयोग किया गया। विश्लेषण से पता चला है कि ग्रीनहाउस गैसें (ज्यादातर मानवजनित) मिलकर वैश्विक औसत तापमान में ~48% की वृद्धि का योगदान करती हैं। ज्वालामुखी विस्फोट जैसी प्राकृतिक घटनाएं GMTA में महत्वपूर्ण योगदान (~23%) करती हैं।

(ग) भा.भू.सं. वैज्ञानिकों ने एक सैद्धांतिक उपकरण विकसित किया है, जो आयनमंडल में ‘सुनामी आने से पहले’ ही उसके अपतटीय संकेत प्राप्त करने की क्षमता रखता है। यह तकनीक तटीय स्थानों पर वास्तविक सुनामी के आगमन का पूर्वानुमान करने के लिए सुनामी लहरों में उत्पन्न ध्वानिक-गुरुत्वाकर्षण तरंगों का उपयोग करती है। उनकी आयनमंडलीय प्रक्रियायों के उपयोग से भूकंप स्रोत विशेषताओं की पहचान करना भा.भू.सं. द्वारा किए गए अनुसंधान का एक अन्य क्षेत्र है। भा.भू.सं. के हाल ही के एक अध्ययन में स्रोत निर्देशिता, स्फुटन प्रसार और संबंधित सतह विरूपण का पता लगाने की दृष्टि से भ्रंश सतह पर और उसके समीप गोरखा नेपाल भूकंप की आयनमंडलीय प्रतिक्रिया की छानबीन की गयी है।

जैसा कि सभी जानते हैं कि मानव वैश्विक जलवायु परिवर्तन के खतरे का सामना कर रहा है। इस संबंध में भा.भू.सं. के शोधकर्ता भारतीय मानसून क्षेत्र से कई तलछटों का विश्लेषण करके पिछली जलवायु की बहु-परोक्षी पुनर्रचना में लगे हुए हैं। भा.भू.सं. संभावित जलभृत क्षेत्रों की पहचान करने और महाराष्ट्र के सख्त चट्टानी इलाकों में भूजल की गुणवत्ता के आकलन में भी अपनी सामाजिक जिम्मेदारी निभा रहा है। सेंटिनल-1 सैटेलाइट से कृत्रिक एपर्चर रडार डेटा का उपयोग करने वाले अध्ययन और निकटवर्ती जीपीएस डेटा से मुख्य हिमालयी प्रणोद के समीपी क्षेत्र में स्खलन/उत्थान/धसकन के परिमाण को समझने में मदद मिली है।

यांत्रिकी समूह संस्थान की वेधशालाओं में प्रयुक्त उपकरणों के विकास और रखरखाव में वैज्ञानिकों की आवश्यकताएं पूरी करता है। इस समूह ने 0.1nT की सटीकता के साथ एक कम लागत वाला प्रोटॉन प्रेसिशन चुंबकत्वमापी संस्थान में ही विकसित किया। इस समूह ने चुंबकीय क्षेत्र डेटा अधिग्रहण के लिए एक अत्याधुनिक विंडोज़-आधारित डेटा लॉगिंग प्रणाली भी विकसित की है। सूर्य-पृथ्वी की अंतर्क्रियात्मक प्रक्रियाओं का अनुकरण करने में वैज्ञानिकों को सशक्त बनाने के लिए भा.भू.सं. में 256-कोर की उच्च निष्पादन संगणना प्रणाली स्थापित की गई है।

संस्थान लगातार तकनीकी विकास कार्यक्रम, परामर्श और सेवाओं के एक भाग के रूप में वैज्ञानिक और तकनीकी विशेषज्ञता का विस्तार करके अपने संसाधनों का भरपूर उपयोग करने का प्रयास कर रहा है। वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए क्षमता निर्माण संस्थान का एक प्रमुख अभियान है। भूचुंबकत्व और संबद्ध क्षेत्रों में अनुसंधान करने के लिए युवा प्रतिभाओं को आकर्षित, प्रेरित और प्रशिक्षित करने के लिए, भा.भू.सं. द्वारा नए पहल कार्य किए गए हैं, जैसे 'पृथ्वी और अंतरिक्ष विज्ञान में अनुसंधान के लिए स्नातकोत्तरों को प्रेरित करना' (IMPRESS) और शोध वैज्ञानिकों को डॉ. नानभॉय मूस पोस्ट-डॉक्टरल फैलोशिप प्रदान करना।

विज्ञान जनसंपर्क कार्यक्रम के तहत, संस्थान छात्रों और उसके संकाय के लिए कई वैज्ञानिक प्रदर्शनियों को बढ़ावा देता है और छात्र हर वर्ष कई राज्य और राष्ट्रीय स्तर के वैज्ञानिक प्रदर्शनों में भाग लेते हैं। भा.भू.सं. को 3-7 जनवरी 2015 को मुंबई में आयोजित 102वीं भारतीय विज्ञान कांग्रेस में गतिशील पृथ्वी और उसका समीपी और सुदूर पर्यावरण : नए प्रतिमान  पर एक विशेष सत्र के आयोजन का गौरव प्राप्त हुआ। भा.भू.सं. ने 7-16 अक्टूबर, 2014 के दौरान हैदराबाद में एन.जी.आर.आई. के साथ संयुक्त रूप से ‘भूचुंबकीय वेधशाला के उपकरण, डेटा अधिग्रहण और प्रसंस्करण' पर 16वीं आई.ए.जी.ए. कार्यशाला का आयोजन किया। कई सम्मेलनों में कर्मचारियों और छात्रों को कई प्रशस्ति-पत्र भी प्रदान किए गए।