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पृथ्वी का चुम्बकत्व :

पृथ्वी की आंतरिक संरचना को समझने एवं खनिज तथा तेल के अन्वेषण में भूभौतिकी की मुख्य भूमिका हैI साधारणतया भूगर्भ में निहित भूभौतिकीय प्रणालियों का सीधा प्रेक्षण नहीं किया जा सकता I उनके अस्तित्व का पता लगाने के लिए उनका घनत्व (गुरुत्वाकर्षण के प्रेक्षण), स्तरीय संरचनाओं में विभिन्न स्तरों से परावर्तन (प्राकृतिक एवं मानवजनित स्रोतों के जरिए भूकम्पीय अध्ययन), तापमान (उष्मा की धारा का अध्ययन), चुम्बकीय अनियमितता का मानचित्रण एवं पुराचुम्बकीय अध्ययन से जुड़ी तकनीकें) एवं विद्युतीय संरचनाएँ (MT एवं विद्युतचुम्बकीय तकनीक) इत्यादि का उपयोग किया जाता है I इन सारी तकनीकों से प्राप्त आंकड़ों के अध्ययन से भूभौतिकी संरचना का अंदाजा लगाया जाता है I इसके अंतर्गत निम्नलिखित क्षेत्रों में अनुसंधान पर जोर दिया जा रहा है :

विद्युतचुम्बकीय प्रेरण अध्ययन :

विद्युतचुम्बकीय प्रेरण पर अवलम्बित चुम्बकीय परिवर्तन एवं मेग्नटोटेल्युरिक तकनीकों का उपयोग, भूगर्भ में निहित संरचनाओं के चित्रीकरण में एवं उस संरचना के भूभौतिकी संकेतों को पहचानने में किया जाता I इसके अलावा इन तकनीकों की क्षमता का अध्ययन किया जा रहा है I

TECTONOMAGNETIC STUDY:

Monitoring of the total geomagnetic field in the vicinity of fault (Jabalpur area) to detect changes in the static part of geomagnetic field due to general tectonic activity and crustal stress accumulation with a view to understanding an earthquake mechanism.

चुम्बकीय असंगति अध्ययन :
वायुचुम्बकीय एवं सतही भूचुम्बकीय आंकड़ों का उपयोग, भारतीय लिथोस्फियर में चुम्बकीय असंगति के अध्ययन में एवं भूविभव प्रक्रियाओं से उनके सम्बंध आदि में किया जाता है I

भूपटल विरुपण अध्ययन :

GPS प्रणाली के उपग्रहों तथा सिंथेटिक अपर्चर रडार (SAR) से प्रेक्षित रेडियो तरंग संकेतों का उपयोग भारतीय क्षेत्र में भूपटल विरुपण अध्ययन में किया जाता हैI

पुराचुम्बकत्व :

संस्थान द्वारा अलीबाग में पुराचुम्बकत्व के अध्ययन के लिए अत्याधुनिक उपकरणों से सुसज्जित प्रयोगशाला स्थापित है, जिसमें चुम्बकीय शून्य क्षेत्र उत्पन्न करनेवाला MAVAC भी सम्मिलित है, जिसका उपयोग शैल के नमूनों के उष्मीय शुद्धीकरण में होता है I

पर्यावरणीय चुम्बकत्व :

तलछटी के नमूनों के खनिजों के चुम्बकीय लक्षणों के उपयोग से पर्यावरण में हुए पुरातनकालीन एवं हाल के परिवर्तन, वातावरण प्रदूषण एवं मनुष्य के जीवन की प्रक्रियाओं के पर्यावरण पर प्रभाव आदि का अध्ययन किया जाता है I इन खनिजों के चुम्बकीय लक्षण के अध्ययन वाली तकनीक से भारतीय झीलों, नदियों की डेल्टा एवं सागर की तलछटी तथा मिट्टी के नमूनों से पुरा-पर्यावरण एवं पुरातनकालीन मौसम का अनुमान लगाया जाता है I

जियोडायनेमो

चुम्बकीय वेधशालाओं में अभिलेखित एवं उपग्रहों से प्राप्त दीर्घकालीन आंकड़ों द्वारा भूचुम्बकीय क्षेत्र में होनेवाले, लम्बे अरसे वाले परिवर्तन के अध्ययन से मुख्य चुम्बकीय क्षेत्र के विकास का सैद्धांतिक अध्ययन किया जा रहा है I



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