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ग्लोबल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम (GNSS) रिसीवर

यंत्र का विवरण:-
निर्माण: ट्रिम्बल; लेईका और सर्पेंट्रियो आदि,
मॉडल: भूगणितीय जीएGNSS रिसीवर
विनिर्देश:
संदर्भ, अभियान और बलगतिकरूप में प्रेक्षण
सिद्धांत
दुनिया में कहीं भी ग्लोबल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम (GNSS) रिसीवरों की भौगोलिक स्थिति का पता लगाने के लिए अंतरिक्ष से संकेत प्रदान करने वाले उपग्रहों के एक नक्षत्र को GNSS कहते हैं। GNSS में यूएसए का ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (जीपीएस), रूस का ग्लोबल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम (GLONASS), यूरोप का गैलीलियो, चीन का बेईडो नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम (बीडीएस) और भारत का भारतीय क्षेत्रीय नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम (IRNSS) शामिल हैं। उपग्रह नेटवर्क में माइक्रोवेव सिग्नल शामिल होते हैं जो स्थिति, वेग और समय की जानकारी प्रदान करने के लिए ज़मीन पर GNSS रिसीवरों को प्रेषित होते हैं जो हमारे दैनिक जीवन में उपयोग केकई अनुप्रयोगों को सक्षम करता है। ये रेडियो तरंगें विद्युतचुम्बकीय ऊर्जा होती हैं जो प्रकाश की गति से आगे बढ़ती हैं। GNSS प्रणाली का प्रचालन एक सरल गणितीय सिद्धांत पर आधारित है, जिसे कई उपग्रहों से मिली जानकारी के साथ गणना के जरिए रिसीवर का पता लगाने के लिए त्रिकोणन कहा जाता है। इस प्रकार निरंतर, अभियान और बलगतिक रूप से प्रेक्षणों का मापन ज़मीन परबहुत ही सटीक रूप से GNSS रिसीवर की स्थिति प्रदान कर सकता है।
अनुप्रयोग
•    सटीक स्थिति, वेग और समय
•    पृथ्वी के स्थतलमंडलीय विरूपण का मापन
•    आयनमंडलीय समग्र इलेक्ट्रॉन मात्रा (टीईसी) का प्रेक्षण
•    वायुमंडलीय जल वाष्प मात्रा का मापन
•    इसके अलावा, GNSS डेटा का उपयोग अंतरिक्ष मौसम की घटनाओं और ऐसे अन्य विशेष अनुप्रयोगों का अध्ययन करने के लिए किया जाता है जो मूल प्रेक्षणआयामों से ऊपर हों

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