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एसजीआरसी शिलांग

Hindi

शिलांग भूभौतिकीय अनुसंधान केंद्र (एसजीआरसी)

भारतीय भूचुंबकत्व संस्थान (भा.भू.सं.) ने शिलांग भूभौतिकीय अनुसंधान केंद्र (एसजीआरसी) को अपने तीसरे क्षेत्रीय केंद्र के रूप में स्थापित करने के लिए एक नई पहल की है। शिलांग के इस नवगठित केंद्र में अनुसंधान का ध्यान उत्तर-पूर्व भारत के विभिन्न वायुमंडलीय क्षेत्रों में पूर्व और सह-भूकंपीय चिह्नकों का आकलन करने पर होगा, जिसके लिए संख्यात्मक प्रतिरूपण उपकरण की सहायता से विभिन्न प्रकार की प्रेक्षण तकनीकों का उपयोग किया जा रहा है। एसजीआरसी मेघालय में ऊपरी शिलांग में एक सुरम्य स्थान विल्टन हॉल एस्टेट में प्रचालित है। एसजीआरसी का भौगोलिक निर्देशांक 25.570N और 91.880E है।

शिलांग भूभौतिकीय अनुसंधान केंद्र का उद्घाटन 18 जनवरी 2016 को भा.भू.सं. की शासी परिषद के अध्यक्ष और सदस्यों, आर.ए.सी. सदस्यों, संस्थान के निदेशक, स्थानीय, राज्य और केंद्र सरकार और उत्तर-पूर्व क्षेत्रों में IMD, NESAC, NIC और NEHU जैसे अन्य वैज्ञानिक संगठनों से गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थिति में माननीय केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा पृथ्वी विज्ञान मंत्री डॉ. हर्षवर्धन के करकमलों से संपन्न हुआ।  माननीय मंत्री ने एसजीआरसी की स्थापना की पहल और भूचुंबकत्व में अग्रणी अनुसंधान के लिए भारतीय भूचुंबकत्व संस्थान (भा.भू.सं., विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के तहत एक प्रमुख अनुसंधान संगठन) के प्रयास की सराहना की। निदेशक, भा.भू.सं. ने गतिशील रूप से युग्मित LAIM (स्थलमंडल - वायुमंडल - आयनमंडल - चुंबकमंडल) प्रणाली को समझने के लिए एसजीआरसी के अनूठे अंतःविषयी शैक्षणिक स्वरूप पर प्रकाश डाला, जिससे भूचुंबकत्व और नये भूकंप अन्वीक्षण और पूर्वेक्षक अध्ययनों के कई विविध क्षेत्रों में वैज्ञानिक प्रयासों को सुविधाजनक बनाया जा सकता है। उन्होंने इस क्षेत्रीय केंद्र में बहु-विषयी अध्ययन के लिए प्रयोगों की स्थापना और विकास की आवश्यकता पर जोर दिया। एसजीआरसी की गतिविधियों में भूचुंबकीय अनुसंधान, भूकंपीय, उच्चतर वायुमंडलीय और आयनमंडलीय अध्ययन के क्षेत्र शामिल हैं। विभिन्न भूभौतिकीय उपकरण जैसे ब्रॉडबैंड भूकंपमापी, त्वरणलेखी, रेडॉन अन्वीक्षक, जल स्तर मापक, जीपीएस, जीएनएसएस, प्रेरण कॉइल चुंबकत्वमापी, ओवरहाऊर चुंबकत्वमापी और फ्लक्सगेट चुंबकत्वमापी पहले से ही एसजीआरसी में काम कर रहे हैं। 

जैसा कि व्यापक रूप से माना गया है, भारत का उत्तर-पूर्वी भाग देश के सबसे सक्रिय भूकंप प्रवण क्षेत्रों में से एक के केंद्र में स्थित है। जनवरी 2016 में मणिपुर में आए भूकंप के दौरान यह क्षेत्र और इसकी जनजातीय आबादी बहुत ही बुरी तरह से प्रभावित हुए। एसजीआरसी में किए जाने वाले अध्ययन भूकंप के स्रोतों और उसके उत्पत्ति तंत्र की बेहतर समझ में योगदान देंगे, जिससे भूकंप से निपटने और पूर्वोत्तर में स्थानीय आबादी के लिए खतरों का आकलन करने की स्थिति में सुधार होगा। भूकंप से निपटने की तैयारी करने वाले क्षेत्रों से आने वाले किसी भी शुरुआती चेतावनी के संकेतों को एसजीआरसी में तैनात किए जाने वाले प्रेक्षण उपकरण द्वारा पता लगाया जा सकता है जो उक्त क्षेत्र में आने वाले भूकंपों के प्रभाव को कम करने में मदद करेगा। अंतिम चुनौती के रूप में, एक एकीकृत भूकंप पूर्व संकेत प्रणाली (IEPSS) के निर्माण के लिए भूकंप घटना की वायुमंडलीय और आयनमंडलीय प्रतिक्रिया के विभिन्न प्रेक्षणों के आधार पर एक भूकंप पूर्वेक्षक प्रतिरूप विकसित करना है। एसजीआरसी भूभौतिकीय अनुसंधान और शिक्षण के लिए एक प्रमुख केंद्र के रूप में उत्तर-पूर्वी क्षेत्र की जरूरतों को पूरा करने का प्रयास करेगा।

शिलांग क्षेत्रीय केंद्र में अनुशासित तरीके से शुरू किए जाने के लिए प्रस्तावित बहु-आयामी अध्ययन क्षेत्र में बड़े भूकंपों के उत्पत्ति तंत्र को समझने के लिए पूर्वोत्तर भारत में असंगत भूकंपीय क्षेत्रों की पहचान करने के लिए एक सार्थक प्रयास है।